घोषणा से बदलाव तक: खुद को खोकर फिर से पाने का सफर - PART 2

उसी दिन से मैंने अपनी पूरी रणनीति पर गहराई से पुनर्विचार करना शुरू कर दिया। मुझे समझ आने लगा था कि बढ़ती हुई कड़ाके की ठंड में खुले में प्रातः भ्रमण लंबे समय तक जारी रखना आसान नहीं होगा। अब मैं किसी भी परिस्थिति में अपनी निरंतरता टूटने नहीं देना चाहता था। इसलिए मै अन्य विकल्पों के बारे में सोचने लगा। ऐसे में जिम जाना एक बहुत ही अच्छा विकल्प लगा। जिम जाने के अपने अलग फायदे थे। एक तरफ वहाँ ठंड से बचाव होता वहीं दूसरी तरफ अपने जैसे संघर्ष कर रहे लोगों को देखकर भीतर एक नई ऊर्जा भी महसूस होती। लेकिन मेरे लिए जिम की अपनी कुछ चुनौतिया भी थी। बचपन से ही मुझे कभी भी बॉडी बिल्डिंग का कोई विशेष शौक नहीं रहा था। इसलिए मैं जिम की मशीनो से ज्यादा परिचित नहीं था। लेकिन काफी सोच विचार के बाद मैंने अंततः जिम जाने का निर्णय ले लिया। 2 जनवरी 2026 को मैंने अपने पड़ोस के जिम संचालक सोनू से बात की और अगले ही दिन 3 जनवरी 2026 से मेरी जिम की शुरुआत हो गई. 

03 जनवरी 2026 की वह सुबह आज भी मेरी यादों में बिल्कुल ताजा है। ठंड अपने चरम पर थी। बाहर घना कोहरा फैला हुआ था और रजाई के भीतर शरीर को मिली थोड़ी सी गर्माहट बाहर निकलने से रोक रही थी। मन बिल्कुल नहीं कर रहा था कि उस ठंड में बाहर जाऊँ। लेकिन इस बार परिस्थितियाँ अलग थीं। भीतर एक अजीब सी जिद जन्म ले चुकी थी। ऐसा लग रहा था कि अगर इस बार खुद को नहीं बदला, तो जिंदगी भर केवल योजनाएँ ही बनाता रह जाऊँगा।

सुबह लगभग 6:30 बजे किसी तरह उठा। तैयार होकर लगभग 7:30 बजे जिम पहुँच गया। ठंड के कारण वहाँ ज्यादा भीड़ नहीं थी। अंदर जाते ही जिम संचालक सोनू ने मुस्कुराते हुए क्रॉस ट्रेनर मशीन की ओर इशारा किया।

मैंने मशीन को बिल्कुल न्यूनतम इन्टेन्सिटी पर सेट किया और धीरे धीरे वर्कआउट शुरू कर दिया। शुरुआत में शरीर बहुत भारी लग रहा था। कुछ ही मिनटों में साँसें तेज होने लगीं लेकिन मन में बस एक ही बात थी कि आज पहला दिन है और चाहे कुछ भी हो जाए रुकना नहीं है । न्यूनतम इन्टेन्सिटी होने की वजह से शरीर पर ज्यादा दबाव नहीं पड़ा और किसी तरह पूरे 20 मिनट क्रॉस ट्रेनर मशीन पर निकाल लिए।

इसके बाद सोनू ने हल्की मुस्कान के साथ मुझे ट्रेडमिल की ओर भेज दिया। ट्रेडमिल आमतौर पर दौड़ने के लिए इस्तेमाल होती है लेकिन उस समय मेरे लिए दौड़ना लगभग असंभव था। शरीर का वजन बहुत ज्यादा होने के कारण मैंने वहाँ भी न्यूनतम स्पीड पर धीरे धीरे वॉकिंग शुरू की। लगभग 20 मिनट चलते चलते साँसें बुरी तरह उखड़ने लगीं। ऐसा महसूस हो रहा था जैसे शरीर जवाब दे देगा।

लेकिन असली संघर्ष अभी बाकी था। इसके बाद सीढ़ियों पर अप-डाउन के  5- 5  के तीन सेट लगाने थे। बड़ी मुश्किल से 5 , 4 , 3 के तीन सेट लगा पाया ।  पहला दिन सच में बहुत कठिन था। हर उखड़ती साँस के साथ मैं खुद को कोस रहा था कि आखिर वजन घटाने का फैसला क्यों किया। पैरों में दर्द था, शरीर टूट रहा था और मन बार बार कह रहा था, “बस, अब छोड़ दो यह सब।”

वर्कआउट खत्म होने के बाद किसी तरह थका हुआ शरीर लेकर घर पहुँचा। अगले कई दिनों तक पैरों में अकड़न बनी रही। सीढ़ियाँ चढ़ना तक मुश्किल लग रहा था। लेकिन इस बार मैंने खुद को रुकने नहीं दिया। यही रूटीन लगातार अगले 14 दिनों तक चलता रहा। रोज सुबह ठंड से लड़ना, जिम जाना, पसीना बहाना और फिर पूरे दिन ऑफिस का काम करना। धीरे धीरे शरीर भी उस कठिन दिनचर्या को स्वीकार करना सीखने लगा।

लगातार 14 दिनों तक उसी रूटीन पर चलने के बाद एक दिन अचानक मन में सवाल उठा कि आखिर इतनी मेहनत का कोई असर हो भी रहा है या नहीं। मैं सीधे वेट मशीन के पास गया और अपना वजन चेक किया। मशीन पर 78.250 किलो देखकर कुछ पल के लिए मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। केवल दो सप्ताह में लगभग 3 किलो वजन कम हो चुका था। मेरे लिए वह किसी छोटी जीत से कम नहीं था।

वजन तेजी से घटता देखकर मेरे भीतर एक अतिरिक्त आत्मविश्वास पैदा होने लगा। मुझे लगने लगा कि अगर मेहनत और बढ़ा दूँ, तो शायद बहुत जल्दी अपने लक्ष्य तक पहुँच जाऊँगा। इसी सोच में मैंने अपने वर्कआउट की तीव्रता पहले से काफी बढ़ा दी।  इतना ही नहीं, तेजी से वजन घटाने की लालसा में अपने डाइटीशियन मित्र की सलाह को नजरअंदाज करते हुए मैंने डाइट से अनाज (रोटी, चावल, ब्रेड, ओट्स  और पोहा आदि ) लगभग पूरी तरह बंद कर दिया। अब मेरी डाइट लगभग पूरी तरह फाइबर और प्रोटीन तक सीमित हो गई थी।

अगले 10 दिनों में मेरा जुनून अपने चरम पर पहुँच गया। कई बार ठंड में जिम खुलने से पहले ही मैं वहाँ पहुँच जाता था। वर्कआउट का समय भी बढ़कर लगभग सवा एक घंटा हो चुका था। वर्कआउट के दौरान शरीर हर समय पसीने से तर रहता और मुझे लगता कि जितनी ज्यादा मेहनत करूँगा, उतनी ही तेजी से मंजिल मेरे करीब आती जाएगी।

31 जनवरी 2026 को जब दोबारा वजन चेक किया तो दिल खुशी से झूम उठा। दो सप्ताह में लगभग 2 किलो वजन और कम हो चुका था। अब मेरा वजन 76.600 किलो था। मशीन पर तेजी से घटते नंबर देखकर मुझे गलतफहमी होने लगी कि शायद 30 अप्रैल 2026 से पहले ही मैं 65 किलो तक पहुँच जाऊँगा। 

31 जनवरी 2026 

अब वेट मशीन मेरे लिए किसी प्रेरणा स्रोत जैसी बन चुकी थी। मशीन पर खड़े होकर घटते नंबर देखना मुझे अंदर से नई ऊर्जा और मोटिवेशन दे देता था।इसलिए हर शनिवार वजन चेक करना मैंने अपनी रणनीति का हिस्सा बना लिया। 

फरवरी आते आते ठंड से थोड़ी राहत मिलने लगी। शरीर का घटता वजन अब मैं खुद महसूस करने लगा था। उत्साह इतना ज्यादा था कि मैंने वर्कआउट में कुछ नई एक्सरसाइज भी जोड़ दीं। अब कुल वर्कआउट टाइम लगभग 1 घंटा 45 मिनट हो गया था जिसमें 1 घंटा कार्डियो और 45 मिनट स्ट्रेंथ ट्रेनिंग शामिल थी। 

लेकिन फरवरी की शुरुआत से ही शरीर पर एक अजीब सी थकान और सुस्ती हावी रहने लगी। ऐसा महसूस होता जैसे शरीर में ऊर्जा बची ही नहीं हो। आँखों में भारीपन रहता, हर समय नींद सी महसूस होती और छोटे छोटे काम भी बोझ जैसे लगने लगे थे। शुरुआत में मुझे लगा कि शायद ज्यादा वर्कआउट की वजह से ऐसा हो रहा है, लेकिन जब लगभग 5  से 10 दिनों तक यही स्थिति बनी रही तो आखिरकार मैंने अपने डाइटीशियन मित्र से बात की।

उसने मेरी पूरी बात सुनकर बहुत आसान भाषा में समझाया, “जैसे मोबाइल में बैटरी कम होने पर वह अपने आप पावर सेविंग मोड में चला जाता है ताकि जरूरी काम चलते रहें, वैसे ही शरीर भी बहुत कम कैलोरी मिलने पर अपना मेटाबॉलिक रेट कम कर देता है।

उसने आगे कहा, “वजन घटाने के कारण तुम पहले ही शरीर की जरूरत से कम कैलोरी ले रहे हो। ऊपर से तुमने भोजन से अनाज भी लगभग बंद कर दिया है। इससे शरीर में ऊर्जा की गंभीर कमी हो गई। शरीर को लगने लगा कि बाहर भुखमरी जैसे हालात हैं, इसलिए उसने अपने जरूरी काम चलाते रहने के लिए ऊर्जा बचानी शुरू कर दी। यही वजह है कि तुम्हें लगातार सुस्ती और कमजोरी महसूस हो रही है। वजन घटाने के लिए कम कैलोरी लेना जरूरी है, लेकिन शरीर को उसके मूल कार्यों के लिए पर्याप्त ऊर्जा मिलना भी उतना ही जरूरी है।

उसने सलाह दी कि सप्ताह में कम से कम 4 से 5 दिन खाने में निर्धारित मात्रा में अनाज और हेल्दी फैट जरूर शामिल करो। उसकी बात सुनकर मुझे अपनी गलती समझ आ गई। उस दिन समझ आया कि वजन घटाने का मतलब शरीर को भूखा रखना नहीं, बल्कि उसके साथ संतुलन बनाना है। मैंने तुरंत अपनी डाइट में किए पुराने बदलावों को निरस्त कर दिया। एक सप्ताह के भीतर फर्क दिखाई देने लगा। शरीर में ऊर्जा लौटने लगी और सुस्ती और आलस की समस्याओ से निजाद मिली।

मार्च की शुरुआत तक मौसम बहुत सुहावना हो चुका था। ना ज्यादा ठंड थी और ना ज्यादा गर्मी। अब मैंने ट्रेडमिल पर धीमी रफ्तार पर रनिंग भी शुरू कर दी थी। इसके साथ साथ कार्डियो से जुड़ी अन्य एक्सरसाइज की इन्टेन्सिटी भी बढ़ा दी। वर्कआउट टाइम बढ़कर लगभग 2 घंटे प्रतिदिन हो गया था। 28 फरवरी तक मेरा वजन घटकर  73.50 किलो तक पहुँच चुका था।

28 फरवरी 2026 

लेकिन अब एक नई चुनौती सामने आने लगी थी। शुरुआती हफ्तों में जहाँ वजन प्रति सप्ताह 1 से 1.5 किलो की दर से  कम हो रहा था वहीं 76 किलो के बाद वजन घटने की रफ्तार  केवल 0.2 से 0.5 किलो प्रति सप्ताह रह गई थी। भरपूर मेहनत और पसीना बहाने के बावजूद वजन उतनी तेजी से नहीं घट पा रहा था। जो लक्ष्य कुछ समय पहले तक आसान लग रहा था, अब वही पहाड़ जैसा दिखाई देने लगा था। धीरे धीरे इससे मेरा उत्साह भी कम होने लगा।

इसी दौरान जिम में मेरे साथ वर्कआउट करने वाले एक फौजी भाई ने मुझे सलाह दी। उसने कहा, “एक समय के बाद वजन घटने की रफ्तार कम हो ही जाती है। अगर वजन तेजी से घटाना है तो ट्रेडमिल का इन्क्लाइन लेवल बढ़ाकर रनिंग शुरू करो।”

उसकी बात सुनकर मैंने भी धीरे धीरे ट्रेडमिल का इन्क्लाइन लेवल बढ़ाते हुए दौड़ना शुरू कर दिया। उस सप्ताह शनिवार को जब मैंने वजन चेक किया तो शानदार नतीजा मिला। इस बार लगभग 0.75 किलो वजन कम हुआ था। मन को एक अलग ही सुकून मिला। मुझे लगने लगा कि शायद यही वह बदलाव था जिसकी मुझे जरूरत थी।

अगले दो हफ्तों तक मैं धीरे धीरे इन्क्लाइन बढ़ाकर ट्रेडमिल पर दौड़ता रहा। जो वजन कुछ समय से रुका हुआ लग रहा था, वह फिर से कम होता दिखाई देने लगा। शुरूआती रफ्तार तो नहीं थी लेकिन इतना जरूर था कि अब मुझे अपने लक्ष्य तक पहुँचने की उम्मीद फिर से दिखाई देने लगी थी।

मध्य मार्च तक मौसम पूरी तरह बदल चुका था। ठंड लगभग खत्म हो गई थी और सुबह की हवा अब पहले से कहीं ज्यादा सहज और सुखद लगने लगी थी। रोज सुबह जिम जाना अब मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। शरीर पहले की अपेक्षा काफी हल्का महसूस होने लगा था और वर्कआउट करते समय पहले जैसी थकान भी नहीं होती थी।

लेकिन इसी दौरान एक नई समस्या धीरे धीरे सामने आने लगी। पता नहीं क्यों मेरे दोनों घुटनों में हल्का दर्द रहने लगा था। उस समय मेरा पूरा ध्यान केवल घटते वजन पर था इसलिए शरीर की इन शुरुआती चेतावनियों को मैंने गंभीरता से नहीं लिया।

लेकिन दिन बीतने के साथ दर्द बढ़ता गया। अब हालत यह हो गई थी कि ट्रेडमिल पर दौड़ना तक पीड़ादायक लगने लगा। एक समय ऐसा भी आया जब दर्द इतना बढ़ गया कि लगभग एक सप्ताह तक मैं ठीक से वर्कआउट ही नहीं कर पाया।

एक बार फिर मैंने अपने डाईटीशियन मित्र को याद किया और उसे अपनी पूरी स्थिति विस्तार से बताई। उसने पूरी बात बहुत ध्यान से सुनी और फिर शांत आवाज में बोला, “जब से तुमने ट्रेडमिल पर इन्क्लाइन लेवल बढ़ाकर दौड़ना शुरू किया है तभी से तुम्हारे घुटनों में दर्द शुरू हुआ है। इन्क्लाइन पर दौड़ने से घुटनों पर सामान्य से ज्यादा भार पड़ता है। तुम्हारा शरीर लंबे समय से कम सक्रिय जीवनशैली का आदी रहा है, इसलिए घुटनों को इतने दबाव की आदत नहीं है। अभी जो दर्द हो रहा है, वह तुम्हारे शरीर का संकेत है कि अब उसे संतुलन और थोड़े आराम की जरूरत है।”

उसने आगे कहा, “अगर दर्द से राहत चाहिए तो तुरंत इन्क्लाइन लेवल बढ़ाकर दौड़ना बंद करो।

मैंने उससे कहा, “इन्क्लाइन लेवल बढ़ाकर दौड़ने से वजन तेजी से घट रहा है। अगर अब यह बंद कर दिया तो मैं निर्धारित समय सीमा में 65 किलो तक कैसे पहुँच पाऊँगा?

उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “65 किलो सिर्फ एक नंबर है। उसे आज नहीं तो कुछ ज्यादा समय देकर कल हासिल कर लोगे। लेकिन अगर जल्दबाजी में घुटनों में कोई गंभीर इंजरी हो गई तो जीवन भर की परेशानी हो जाएगी। वजन घटाना जरूरी है लेकिन सुरक्षित तरीके से। हो सके तो कुछ समय के लिए दौड़ना बंद कर दो.  नहीं कर सकते तो तुम्हें तुरंत इन्क्लाइन लेवल 0 पर दौड़ना चाहिए।

उसकी यह बात मेरे भीतर कहीं गहराई तक उतर गई। मैं समझ चुका था कि कई बार लक्ष्य तक जल्दी पहुँचने की बेचैनी इंसान को अपने ही शरीर के खिलाफ खड़ा कर देती है। अगर शरीर में विकार आ  जाए, तो फिर किसी भी लक्ष्य का क्या अर्थ रह जाएगा।

डाईटीशियन मित्र की सलाह को गंभीरता से लेते हुए मैंने उसी दिन से इन्क्लाइन लेवल 0 पर दौड़ना शुरू कर दिया। अगले दो सप्ताह तक मैंने बिल्कुल उसी की सलाह के अनुसार वर्कआउट किया। धीरे धीरे घुटनों का दर्द लगभग खत्म होने लगा। चलने और दौड़ने में पहले जैसा दर्द महसूस नहीं होता था। साथ ही  दूसरी तरफ वजन फिर अपनी पुरानी धीमी रफ्तार पर आ गया था। पहले जहाँ हर सप्ताह संतोषजनक वजन कम हो जाता था, उसकी गति एक बार फिर धीमी पड़ गयी थी। 

दिनांक 04 अप्रैल शनिवार को जब मैंने वजन चेक किया तो मेरा वजन घटकर 70.550 किलो हो चुका था।

04 अप्रैल 2026 

अब मेरा शरीर शुरुआत की तुलना में काफी हल्का दिखने लगा था। कपड़ों की फिटिंग बदल चुकी थी। चेहरा पहले से पतला लगने लगा था। परिवार वाले, पड़ोसी, ऑफिस के साथी और मित्र सभी अब मुझे सलाह देने लगे थे कि अब वजन काफी कम हो गया है, वजन घटाने का यह प्रोग्राम बंद कर दो। 

सच कहूँ तो एक पल के लिए मैंने भी सोचा कि शायद अब रुक जाना चाहिए। आखिर 84 किलो से यहाँ तक पहुँचना अपने आप में कोई छोटा संघर्ष नहीं था।

लेकिन अगले ही पल मन में दूसरा विचार आया। जब इतना लंबा सफर तय कर ही लिया है तो अब मंजिल के इतने करीब आकर क्यों रुकना। लक्ष्य चाहे पूरा हो या ना हो लेकिन निर्धारित समय सीमा तक पूरी ईमानदारी से मेहनत जरूर करनी चाहिए। यही सोचकर मैंने अपना सफर जारी रखा।

18 अप्रैल शनिवार को जब मैंने वजन चेक किया तो वह 69.050 किलो था।

18 अप्रैल 2026 

अब मेरे पास मात्र 2 सप्ताह बचे थे और लक्ष्य तक पहुँचने के लिए लगभग 4 किलो वजन और कम करना था। मैं अच्छी तरह समझ चुका था कि 2 सप्ताह में 4 किलो वजन कम करना लगभग असंभव कार्य है। लेकिन इस बार मैंने निराश होने के बजाय अपनी सोच में छोटा सा बदलाव किया।

मैंने खुद से कहा, “अगर 65 किलो तक नहीं पहुँच पा रहे तो कम से कम उसके जितना ज्यादा करीब पहुँचा जा सके उतना पहुंचेगे।

यही सोचकर मैंने अपने वर्कआउट में एक छोटा सा हैक किया।

अब मैं जान चुका था कि इन्क्लाइन लेवल बढ़ाकर दौड़ने से वजन तेजी से घटता है लेकिन उसमें घुटनों में इंजरी होने की संभावना भी बहुत ज्यादा रहती है। इसलिए मैंने एक संतुलित रास्ता चुना। अब मैं ट्रेडमिल का इन्क्लाइन अधिकतम स्तर पर रखता, लेकिन दौड़ने के बजाय केवल 10 मिनट सामान्य गति से पैदल चलता। 

हालाँकि मुझे नहीं लगता कि इससे कोई बहुत बड़ा बदलाव आया होगा, लेकिन इतना जरूर था कि इससे मुझे मानसिक रूप से यह संतोष मिलता रहा कि मैं  अपने इस सफर के अंतिम समय तक अपनी तरफ से पूरी ईमानदारी के साथ प्रयास कर रहा हूँ।

दिनांक 25 अप्रैल 2026 को मेरा वजन घटकर 68.4 किलो तक पहुँच गया था।

25 अप्रैल 2026 

हालांकि शुरुआत में मैंने अपनी इस यात्रा की समाप्ति के लिए 30 अप्रैल की तारीख तय की थी लेकिन क्योंकि मैं हर शनिवार को ही वजन चेक कर सप्ताह का परिणाम जानता था और 30 अप्रैल गुरुवार को पड़ रहा था इसलिए मैंने इस यात्रा की समाप्ति की तारीख बदलकर 02 मई 2026 शनिवार कर दी।

इस तरह अब मेरे पास सिर्फ एक सप्ताह बचा था और लक्ष्य से लगभग 3 किलो की दूरी बाकी थी।

घोषणा से बदलाव तक: खुद को खोकर फिर से पाने का सफर - PART 1

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