एक ट्रांसफॉर्मर, एक स्कूल और अनमोल यादें...

जुलाई 2012 की उमसभरी दोपहर थी। मैं रोज़ की तरह अपने काम में व्यस्त था। उस समय मैं UPPCL में सहायक भण्डारी के पद पर कार्यरत था और मेरठ जनपद में क्षतिग्रस्त ट्रांसफॉर्मर बदलवाने की जिम्मेदारी मेरे पास थी। गर्मियों में भंडार केंद्र पर ग्रामीण उपभोक्ताओं की हमेशा भीड़ लगी भीड़ लगी रहती थी।

उस दिन इसी भीड़ में से निकलकर एक सुसंस्कृत और पढ़े लिखे सज्जन मेरे पास आए। गर्मी से बेहाल, पसीने से लथपथ, उन्होंने तुरंत 63 KVA ट्रांसफॉर्मर की मांग रखी। मैं उनकी बात समझ ही रहा था कि पीछे से एक परिचित चेहरा नजर आया, शोबीर जी

जैसे ही मैंने उन्हें देखा, वर्षों पुरानी यादें ताज़ा हो गईं। जवाहर नवोदय विद्यालय, सरधना… आवासीय विद्यालय जहां मैंने 1993 से 2000 तक पढ़ाई की थी। शोबीर जी वहीं वाहन चालक थे। मैंने तुरंत उन्हें पहचान लिया और अभिवादन किया। पहले तो वे मुझे पहचान नहीं पाए, लेकिन जैसे ही मैंने अपना परिचय दिया और बताया कि कैसे स्कूल के दिनों में उन्होंने मुझे कई बार बीमार होने पर स्कूल से घर छोड़ा था, उनके चेहरे पर खुशी साफ झलकने लगी।

बड़े उत्साह से उन्होंने पास खड़े उन्ही सज्जन की ओर इशारा करते हुए कहा, “विशाल भाई, ये हमारे स्कूल के भूगोल के अध्यापक हैं।”

यह जानते ही मैंने आदरपूर्वक सर का अभिवादन किया और फिर दोनों को बैठाकर जलपान कराया। थोड़ी बातचीत के बाद सर ने अपनी समस्या बताई, विद्यालय का 63 KVA ट्रांसफॉर्मर खराब हो गया था। दो दिनों से विद्यालय में बिजली नहीं थी। बच्चे अंधेरे में रह रहे थे और अब पानी की भी समस्या खड़ी हो गई थी।

मैंने तुरंत उनके पेपर देखे। समस्या यह थी कि ट्रांसफॉर्मर का एस्टीमेट अभी तक पास नहीं हुआ था। मैंने तुरंत संबंधित वितरण खंड कार्यालय में फोन किया और अपने ऑफिस से एक स्टाफ को सभी कागज़ देकर एस्टीमेट पास कराने भेज दिया।

लेकिन असली चुनौती अभी बाकी थी।

भंडार केंद्र में उस समय 63 KVA का एक भी स्वस्थ ट्रांसफॉर्मर उपलब्ध नहीं था। उमस भरी भीषण गर्मी में विद्धुत मांग बढ़ने के चलते ट्रांसफॉर्मर पर लोड काफी बढ़ जाता है। इस कारण गर्मी में ट्रांसफॉर्मर की क्षतिग्रस्तता दर काफी बढ़ जाती है। जिससे गर्मी में स्वस्थ ट्रांसफॉर्मर की उपलब्धता कभी कभी शून्य हो जाती है। लेकिन यह सिर्फ एक ट्रांसफॉर्मर नहीं था, यह मेरे अपने स्कूल का ट्रांसफॉर्मर था। वही जगह जहां मेरा बचपन बीता था।

मैंने विभागीय कार्यशाला में संपर्क किया, लेकिन वहां से मना कर दिया गया। फिर एक प्राइवेट वेंडर जो विभाग के लिए ट्रांसफॉर्मर मरम्मत करता था, से बात की तो पता चला कि मेरठ का कोई ट्रांसफॉर्मर तैयार नहीं है, लेकिन हापुड़ जनपद का एक ट्रांसफॉर्मर उपलब्ध है। मैंने तुरंत हापुड़ के स्टोर इंचार्ज से बात की और उन्होंने बिना किसी हिचक के ट्रांसफॉर्मर देने के लिए हामी भर दी।

करीब एक घंटे के अंदर ट्रांसफॉर्मर भंडार केंद्र पहुंच गया।

ट्रांसफॉर्मर मिलते ही सर और शोबीर जी के चेहरे पर राहत और खुशी साफ दिख रही थी। सर बोले, “अब मैं बिजलीघर फोन करके इसे आज ही चालू करवाने की कोशिश करता हूं।”

मैंने मुस्कुराते हुए कहा, “सर, आप रहने दीजिए, मैं बात करता हूं।”

मैंने संबंधित बिजलीघर पर तैनात अपने मित्र, अवर अभियंता मनोज कुमार जी को फोन किया और उनसे अनुरोध किया कि नवोदय विद्यालय का परिवर्तक अगले 1 घंटे में विद्यालय पहुँच रहा है उसको आपको आज ही चालू कराना है। उन्होंने भी तुरंत आश्वासन दे दिया।

सर ने भावुक होकर कहा, “विशाल जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद। अगर आप मदद न करते तो बच्चों को आज रात भी अंधेरे में ही गुजारनी पड़ती।”

मैंने हल्की मुस्कान के साथ जवाब दिया, “सर, मैंने तो सिर्फ अपनी ड्यूटी निभाई है।”

सर और शोबीर जी ट्रांसफॉर्मर लेकर स्कूल की ओर रवाना हो गए। मैं वहीं खड़ा सोचता रहा...

मदद आखिर किसने किसकी की… मैंने उनकी या उन्होंने मुझे यह अवसर देकर मेरी, कि मैं अपने अतीत, अपने स्कूल, अपने बचपन के लिए कुछ कर सकूं?

उस दिन काम तो रोज़ जैसा ही था, लेकिन दिल को जो सुकून मिला, वह कुछ अलग ही था। 



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