यह बात नवम्बर 2020 की है। देश कोरोना महामारी के कठिन दौर से गुजर रहा था। तब तक हम तीन लॉकडाउन झेल चुके थे। चारों ओर अनिश्चितता, भय और संदेह का माहौल था। हालात ऐसे थे कि कोरोना के शक में लोग एक दूसरे से मिलने से भी कतराने लगे थे। इसी बीच मेरा ट्रांसफर मेरठ से धामपुर हो गया।
मैंने कार में एक फोल्डिंग, रजाई और गद्दा रखा और मेरठ से धामपुर के लिए निकल पड़ा। मन में पूरा भरोसा था कि पहुँचते ही रहने का कोई न कोई इंतजाम हो जाएगा। सुबह करीब 10 से11 बजे मैं धामपुर पहुँच गया। मेरठ से लगभग 125 किलोमीट दूर बिजनौर जिले में पहाड़ों की तलहटी में बसा यह कस्बा पहली ही नजर में मन मोह लेने वाला था। चारों ओर हरियाली, साफ हवा और एक सुकून भरा वातावरण।
ऑफिस पहुँचकर ज्वाइनिंग दी और कार्यभार ग्रहण करने की औपचारिकताएँ पूरी करने लगा। साथ ही ऑफिस स्टाफ से रहने के लिए कमरे की व्यवस्था करने को कहा। लेकिन कोरोना की दहशत इतनी थी कि कोई भी कमरा देने को तैयार नहीं था। शाम होते होते ऑफिस स्टाफ ने भी हाथ खड़े कर दिए।
इसी दौरान मुझे बैचमेट जोगिंद्र (2000) की बात याद आई जिसने बताया था कि हमारे ही बैच के कुलदीप (2000) जो पेशे से अध्यापक हैं उनकी पोस्टिंग धामपुर के आसपास ही है। मैंने जोगिंद्र से नंबर लिया और कुलदीप को फोन कर अपनी समस्या बताई। कुलदीप की पोस्टिंग धामपुर से 12 से 15 किलोमीटर दूर एक गाँव में थी, लेकिन वह अपने परिवार के साथ धामपुर में ही किराए के मकान में रहता था।
फोन किए अभी 15 से20 मिनट ही हुए थे कि कुलदीप खुद मेरे ऑफिस पहुँच गया। उसने बिना किसी भूमिका के कहा
“शाम हो गई है अब कमरा मिलना मुश्किल है। आज रात तू मेरे साथ ही रुकेगा। कल देखते हैं।” मेरे पास भी कोई और विकल्प नहीं था। मैं कुलदीप के साथ उसके घर चला गया। वहाँ उसने बड़े अपनत्व से अपने परिवार से मिलवाय। रात को स्वादिष्ट भोजन कराया और देर रात तक हम दोनों अपने नवोदय स्कूल के दिनों की यादों में खोए रहे।
अगले दिन सुबह फिर स्नेह से भरा नाश्ता कराया। कुलदीप मुझे अपने घर के आसपास कुछ कमरे दिखाने भी ले गया, लेकिन किसी न किसी कारण से बात नहीं बन पाई। उस दिन भी कमरे की व्यवस्था नहीं हो सकी। फिर भी कुलदीप और उसके परिवार के प्रेम और अपनत्व ने यह एहसास ही नहीं होने दिया कि मैं एक अनजान शहर में हूँ और दो दिन से मेरी अपनी कोई छत नहीं है। उस समय कुलदीप ने जो बात कही, वह आज भी याद है
“परेशान मत हो। एक हफ्ता लगे या एक महीना जब तक कमरा नहीं मिलतातू मेरे साथ ही रहेगा।”
तीसरे दिन आखिरकार मुझे धामपुर में कमरा मिल गया। जाते समय मैंने कुलदीप का दिल से धन्यवाद किया। इस पर उसने मुस्कराते हुए बस इतना कहा
“अपने बीच धन्यवाद की कोई जरूरत नहीं है।”
कोरोना के उस भयावह दौर में जब लोग एक दूसरे से दूरी बना रहे थे उस समय एक नए शहर में ये आश्रय मिलना सिर्फ दोस्ती नहीं थी। यह नवोदय की बॉन्डिंग थी जिसने कोरोना के डर को किनारे रखकर अपनापन निभाया।

टिप्पणियाँ