तारीख 7 से 10 मार्च 2025
इस बार की यात्रा हमारे लिए सिर्फ एक ट्रिप नहीं थी, बल्कि परिवार के साथ बिताया गया एक ऐसा समय था जिसमें रोमांच, थकान, हल्की परेशानियां और मन को छू लेने वाला सुकून सब कुछ शामिल था। मैं, पत्नी नेहा, बेटी नम्रता और बेटा कुणाल, चारों एक साथ माता वैष्णो देवी के लिए निकले।
दिल्ली सराय रोहिला से रात 10:30 बजे ट्रेन पकड़ी। सफर की शुरुआत थोड़ी धीमी रही क्योंकि ट्रेन करीब तीन घंटे लेट थी। रात का सफर वैसे ही थकाने वाला होता है, और देरी ने उसे थोड़ा और लंबा बना दिया।
जम्मू पहुंचते ही सबसे पहली समस्या मोबाइल नेटवर्क की आई। अचानक ऐसा लगा जैसे हम बाहरी दुनिया से कट गए हों। उस समय यह अहसास हुआ कि तकनीक पर हमारी निर्भरता कितनी बढ़ चुकी है। नया सिम लेकर जब नेटवर्क वापस आया तो एक तरह की राहत महसूस हुई।
जम्मू स्टेशन से बाहर निकलते ही कटरा जाने के लिए बस मिल गई, लेकिन यहां का अनुभव थोड़ा अलग रहा। टिकट के नाम पर एक साधारण पर्ची दी गई और बस में सीटों को लेकर कोई तय व्यवस्था नहीं थी। किराया भी तय से ज्यादा लिया गया।
थोड़ी बहस और समझाने के बाद हमें सीट मिल गई, लेकिन यह साफ हो गया कि यात्रा में सतर्क रहना बहुत जरूरी है।
दोपहर करीब 2:30 बजे हम कटरा पहुंचे। होटल में पहुंचकर थोड़ा आराम किया, चाय पी और फिर शाम 4 बजे यात्रा शुरू करने का फैसला किया। हमने सिर्फ जरूरी सामान ही साथ रखा और बाकी लॉकर में जमा कर दिया। यही फैसला आगे चलकर बहुत काम आया।
बाणगंगा से आगे बढ़ते ही असली यात्रा शुरू हुई। शुरुआत में उत्साह ज्यादा था, लेकिन धीरे धीरे चढ़ाई का असर शरीर पर दिखने लगा। रास्ते में अलग अलग तरह के लोग दिख रहे थे। कोई तेजी से जा रहा था, कोई धीरे धीरे, और कोई बीच बीच में रुककर सांस ले रहा था। नेहा पूरे आत्मविश्वास के साथ लगातार आगे बढ़ रही थीं। मैं थोड़ा पीछे रहकर आराम आराम से चल रहा था। नम्रता और कुणाल कभी आगे निकल जाते, कभी हमारे साथ हो लेते।
रास्ते में छोटे छोटे ढाबे, चाय की दुकाने और रुकने के स्थान मिलते रहे, जिससे थोड़ा आराम मिलता रहा।
करीब 7 बजे हम अर्धकुंवारी पहुंचे। वहां पहुंचकर ऐसा लगा जैसे एक बड़ी मंजिल पार कर ली हो। थकान तो थी, लेकिन साथ में संतोष भी था। थोड़ी देर आराम करने के बाद शरीर ने भी राहत महसूस की।
अगले दिन सुबह का माहौल बहुत शांत और ताजा था। हल्की ठंडक और पहाड़ों की हवा एक अलग ही ऊर्जा दे रही थी। हम 7:30 बजे तक तैयार होकर आगे बढ़े।
अर्धकुंवारी से हिमकोटी का रास्ता पहले के मुकाबले आसान लगा। रास्ता साफ था और चढ़ाई भी उतनी कठिन नहीं थी। लगभग दो घंटे में हम भवन पहुंच गए।
दर्शन के लिए अपना सारा इलेक्ट्रॉनिक सामान लॉकर में जमा कराया। इस समय भीड़ ज्यादा नहीं थी, इसलिए बिना ज्यादा इंतजार के हमें माता के दर्शन करने का अवसर मिला।
जब हम अंदर पहुंचे तो मन अपने आप शांत हो गया। ज्यादा शब्दों की जरूरत नहीं थी, बस एक संतोष था कि इतनी दूरी तय करके हम यहां तक पहुंचे। नम्रता और कुणाल के चेहरे पर जो खुशी थी, वह इस यात्रा की सबसे सुंदर याद बन गई।
दर्शन के बाद हमने रोपवे से भैरव मंदिर जाने का निर्णय लिया। यह छोटा सा सफर बहुत रोचक लगा। ऊपर पहुंचकर जो दृश्य दिखाई दिया, वह सच में यादगार था।
चारों तरफ पहाड़, नीचे घाटियां और बीच में तैरते बादल। ऐसा लग रहा था जैसे हम बादलों के बीच खड़े हों। हवा हल्की और बहुत शुद्ध थी। कुछ देर हमने वहीं खड़े होकर बस उस माहौल को महसूस किया।
यह पल यात्रा का सबसे शांत और सुंदर हिस्सा बन गया।
वापसी में शुरुआत तो आसान लगी, लेकिन जैसे जैसे हम अर्धकुंवारी से नीचे उतरने लगे, थकान बढ़ती गई। पैरों में दर्द साफ महसूस हो रहा था और हर कदम थोड़ा भारी लग रहा था।
बाणगंगा पहुंचते ही हमने तय किया कि अब आगे पैदल नहीं चलना है। ऑटो लेकर होटल पहुंचे। नहाने के बाद शरीर को काफी राहत मिली।
खाने के लिए पास के एक ढाबे पर गए। साधारण खाना था, लेकिन स्वाद बहुत अच्छा लगा। शायद पूरे दिन की थकान और भूख ने उसे और स्वादिष्ट बना दिया।
सुबह फिर उसी ढाबे पर नाश्ता किया। उसके बाद हम कटरा मार्केट घूमने निकल गए। यहां की दुकानों में काफी वैरायटी थी, लेकिन मोलभाव करना बहुत जरूरी था। नेहा ने बहुत समझदारी से खरीदारी की और अच्छे दाम पर सामान लिया।
शाम तक हम जम्मू वापस पहुंचे। प्लान था बाग ए बाहु गार्डन जाने का, लेकिन समय बाजार और मेले में ही निकल गया।
स्टेशन पर पहुंचकर असली भागदौड़ शुरू हुई। बार बार प्लेटफॉर्म बदलने की घोषणा हो रही थी। भारी सामान के साथ सीढ़ियां चढ़ना उतरना काफी थकाने वाला था।
फिर कोच नंबर में बदलाव ने थोड़ी और परेशानी बढ़ा दी। कुछ समय के लिए हल्की अफरा तफरी का माहौल बन गया, लेकिन आखिरकार हम अपनी सीट तक पहुंच गए। रात करीब 11:45 बजे ट्रेन मेरठ के लिए रवाना हो गई।
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