यह घटना 24 अक्टूबर 2014 की है। उस दिन मैं अपने परिवार के साथ हरिद्वार से मेरठ लौट रहा था। साथ में मेरे पिताजी, पत्नी, बेटा और मेरा भाई भी थे। सफर सामान्य ही चल रहा था, लेकिन मुझे शुरू से ही कार में कुछ गड़बड़ी महसूस हो रही थी। मैंने रास्ते में तीन बार पिताजी से कहा भी कि गाड़ी में कुछ समस्या है, लेकिन हम धीरे धीरे आगे बढ़ते रहे।
रुड़की अब लगभग 7 से 8 किलोमीटर ही दूर रह गया था। आसपास हल्की बसावट दिखने लगी थी, लेकिन सड़क काफी सुनसान थी। आखिरकार मैंने गाड़ी को सड़क के किनारे रोका और बोनट खोलकर खुद ही देखने लगा कि समस्या क्या है। करीब 15 से 20 मिनट तक कोशिश करने के बाद मैंने सोचा कि किसी तरह रुड़की पहुंचकर ही गाड़ी दिखवा लेंगे।
लेकिन जैसे ही मैंने गाड़ी स्टार्ट कर पहला गियर डाला, गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ी। अब चिंता सिर्फ गाड़ी की नहीं रही, बल्कि परिवार की सुरक्षा भी मन में आने लगी। रात के करीब 8 बज चुके थे, आसपास कोई मदद नजर नहीं आ रही थी और हम एक तरह से बीच रास्ते में फंस गए थे।
इसी बीच एक बाइक पर सवार एक युवक हमारे पास आकर रुका। वह लगभग 24-25 साल का रहा होगा। बिना कुछ पूछे उसने खुद ही गाड़ी की स्थिति समझने की कोशिश की। उसने मुझसे चाबी ली, गाड़ी स्टार्ट करके देखी और तुरंत समझ गया कि समस्या क्या है। उसने अपने फोन से किसी को कॉल किया और उसे वहां बुला लिया।
अब तक हमने उससे मदद भी नहीं मांगी थी, लेकिन उसने इंसानियत के नाते खुद पहल की। उसने बताया कि गाड़ी की क्लच प्लेट खराब हो गई है और उसका गैराज यहां से लगभग 2 किलोमीटर पीछे है। उस समय हमारी प्राथमिकता रुड़की की ओर बढ़ने की थी, लेकिन परिस्थितियां ऐसी थीं कि हमें उसी पर भरोसा करना पड़ा।
उस युवक ने अपना नाम सरफराज बताया। थोड़ी ही देर में उसका एक साथी कार लेकर वहां पहुंच गया। उन्होंने हमारी गाड़ी को रस्सी से बांधा और हमें अपने गैराज तक ले गए।
रात बढ़ती जा रही थी, लेकिन उनकी मेहनत और लगन देखने लायक थी। करीब 8:40 बजे तक वे पूरी तरह काम में जुट गए। थोड़ी ही देर में उनके साथी ने नई क्लच प्लेट भी मंगवा ली। एक ग्राहक होने के नाते मुझे उसकी गुणवत्ता को लेकर थोड़ा संदेह हुआ, लेकिन उन्होंने भरोसा दिलाया कि यह ओरिजिनल पार्ट है।
लगभग रात 11 बजे तक उन्होंने पूरी मेहनत से गाड़ी को ठीक कर दिया। उसके बाद सरफराज ने खुद मुझे गाड़ी की टेस्ट ड्राइव कराई। गाड़ी अब पहले जैसी बिल्कुल सही चल रही थी।
उस समय जो राहत और सुकून मिला, उसे शब्दों में बताना मुश्किल है। जिस परिस्थिति में हम फंसे थे, वहां कोई भी आसानी से हमसे 10-15 हजार रुपये ले सकता था। लेकिन उन नेकदिल लोगों ने सिर्फ क्लच प्लेट और मेहनताना मिलाकर कुल 3400 रुपये ही लिए।
मैंने सरफराज से उसका मोबाइल नंबर लिया और उससे कहा कि अगर वह उस समय मदद न करता, तो शायद हम न जाने कितनी मुश्किलों में फंस जाते। इस पर उसने बहुत सादगी से जवाब दिया कि अगर आपके साथ परिवार, खासकर महिला और बच्चा न होता, तो शायद मैं भी यूं ही निकल जाता।
उसकी यह बात दिल को छू गई।
अगले दिन घर पहुंचकर मैंने उसे फोन किया और दिल से धन्यवाद दिया। आज भी जब उस घटना को याद करता हूं, तो लगता है कि दुनिया में अच्छे लोग आज भी मौजूद हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के मदद के लिए आगे आते हैं।
मैं आप सभी से भी यही कहना चाहता हूं कि अगर कभी मौका मिले, तो ऐसे लोगों का हौसला जरूर बढ़ाइए। फोन पर कहा गया एक छोटा सा धन्यवाद भी किसी के लिए बड़ी प्रेरणा बन सकता है।
10 सितंबर 2019- रुड़की में सरफराज के साथ |
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Agar sabhi Sarfaraz ban jaye to burai to khud ba khud khatm ho jayegi...
Thanks to #sarfarazbhai